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त्रिमूर्ति शिव

त्रिमूर्ति शिव – अर्थ

परमपिता शिव जो सदेव निराकारी है चक्र (कल्प) के अंत में मनुष्य सृष्टि में अवतरित होकर संगम युग के १०० साल में इस सृष्टि में तीन अलग-अलग मूर्तियों के द्वारा – ब्रह्मा शंकर विष्णु – प्रत्यक्ष होते हैं | मूर्ति माना मनुष्य शरीर | परमपिता शिव तीन निमित्त बनी हुई मनुष्य आत्माओं के द्वारा तीन कार्य संपन्न करते-कराते  हैं : नयी दुनिया की स्थापना (ब्रह्मा के द्वारा), पुराणी दुनिया का विनाश (शंकर द्वारा), नयी दुनिया की पालना (विष्णु द्वारा) | वे स्वयं दिखाते है कि कर्म कैसे करना है (ब्रह्मा के द्वारा); दूसरों से कर्म कराते हैं (शंकर के द्वारा) और अपनी संपन्न शक्ती और संपन्न कार्य को विष्णु के द्वारा प्रत्यक्ष करते है जो  स्त्री-पुरुष पवित्र के संस्कारों के मेल का मूर्त रूप बन जाता है | यह सब कुछ करने-कराने के लिए सदा निराकारी शिव को मनुष्य तन चाहिए | इसीलिए १०० साल के संगम युग में उनको दो रथों की दरकार है | रथ अर्थात निमित्त बना हुआ शरीर |  वे दो रथ हैं :

– इस सृष्टिरूपी रंगमंच की हेरोइन (मुख्य नायिका) का शरीर; दुसरे शब्दों में अपने अंतिम जन्म में उस मनुष्य आत्मा का शरीर जो  कृष्ण अथवा ब्रह्मा बाबा अथवा दादा लेखराज का पार्ट बजाती है |

– इस सृष्टिरूपी रंगमंच के हिरो (मुख्य नायक) का शरीर; दुसरे शब्दों में अपने अंतिम जन्म में उस मनुष्य आत्मा का शरीर जो राम अथवा प्रजापिता का पार्ट बजाती है |

ये दो आत्माएं प्रजापिता और ब्रह्मा हैं अर्थात वे दो मनुष्य सृष्टि के माता पिता के पार्ट बजाती हैं | इन दो आत्माओं के द्वारा शिव सब मनुष्य आत्माओं के प्रति पहले माता का पार्ट (ब्रह्मा), बाद में बाप शिक्षक सदगुरु का पार्ट (प्रजापिता के द्वारा) बजाते हैं |

आगे शिवबाबा का त्रिमूर्ति शिव के बारे में बैसिक पाठ है | इसको समझने के बाद त्रिमूर्ति शिव को अड्वैन्स में समझ सकते हैं | त्रिमूर्ति शिव की पूरी पहचान माना भगवान, मनुष्य, सृष्टि आदि मध्य अंत के रहस्यों को समझना |

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