दिल्ली में सूर्योदय | ज्ञान के सूर्य शिवबाबा के लिए |

दुनिया के सब लोगों के प्रति शिवबाबा का सन्देश और ज्ञान |

ज्ञान का सार

शिवबाबा – बाप शिक्षक सदगुरु

मनुष्य के तीन बाप होते हैं | पहला बाप सब आत्माओं का बाप अर्थात परमपिता शिव है | दूसरा है प्रजापिता जो साकार मनुष्य सृष्टि का पिता है | तीसरा है इस जन्म का बाप |


परमपिता परमात्मा शिव १९३६ – २०३६ के बीच अर्थात संगम युग में साधारण मनुष्य के तन में आकर सारी दुनिया को यह ज्ञान सूना रहे हैं |

आत्मा

शरीर अलग है, मनुष्य आत्मा अलग है | दोनों के  मेल को जीवात्मा अथवा मनुष्य कहा जाता है | जीवात्मा शरीर को चलानेवाली अदृश्य शक्ति है | आत्मा और शारीर अलग-अलग होकर कुछ भी नहीं कर सकते | आत्मा अति सूक्ष्म शक्ति का बिंदु है जिसको चेतन्य अणु कहा जा सकता है | यह चेतन्य ज्योतिर्बिंदु है जिसकी तीन शक्तियां हैं : मन, बुद्धि और अनेक जन्मों के संस्कार | आत्मा जन्म-मरण के चक्र में आती है | हर कल्प में ज्यादा से ज्यादा ८४ और कम से कम १ जन्म ले सकती है | जब परमधाम से इस सृष्टि में आती है तब अभिनेते की तरह अपने पार्ट बजाना शुरू करती है | तब से दूसरी आत्माओं के प्रभाव में आकर और उन पर अपना प्रभाव डालकर अच्छे-बुरे कर्मों के हिसाब-किताब तैयार करती है | अनेक जन्मों से गुज़रते-गुज़रते  धीरे-धीरे कमज़ोर बनती है | उसका  मन और बुद्धि पत्थर जैसे बन जाते हैं |

परमात्मा

वह सब आत्माओं का पिता है | आत्माओं की तरह वह भी अदृश्य शक्ति का बिंदु है, परन्तु उनसे और सूक्ष्म है | उसका नाम शिव अर्थात कल्याणकारी है | वह हर प्रकार के प्रभाव से सदेब परे है, सदेव निराकारी, कर्म और भोग से परे है | वह एक ही है जो मनुष्य सृष्टि का आदि मध्य अंत को जानता है | सृष्टि के हर चक्र  के अंत में आकर मनुष्यों को सच्चा ज्ञान देता है |  वह एक ही है जो जन्म-मरण के चक्र में न आने के कारण सदेव पवित्र है इसीलिए वही आत्माओं और ५ तत्त्वों को पावन बनाकर आदि के सतोप्रधन के स्टेज में पहुंचाता है | परमपिता शिव के मनुष्य सृष्टि में तीन कार्य हैं : नयी दुनिया की स्थापना, पुरानी दुनिया का विनाश और नयी रचना की पालना |  उसका अपना शरीर न होने के कारण उसको मनुष्य तन में आधार लेना पड़ता है | संगम युग पर ही जब वह साकारी सृष्टि में आता है तीन कार्य संपन्न करने वह तीन मनुष्य आत्माओं के शरीरों के आधार लेता है | वे हैं क्रमशः ब्रह्मा, शंकर, विष्णु |

परमधाम

पृथ्वी ब्रह्माण्ड का मध्य है जहां हर कल्प में स्वर्ग और नरक बनते हैं | दुसरे शब्दों में यह  मनुष्य सृष्टि या ५ तत्त्वों की दुनिया अथवा रंगमंच है जिस पर मनुष्य नाटक चलता है |  साकारी श्रृष्टि से परे सूक्ष्म वतन अर्थात संकल्पों से रचा हुआ वतन है जो साकारी हद से परे है |  साकारी और आकारी सृष्टि से परे परमधाम है | परमधाम अर्थात उंच ते ऊँचा धाम अथवा  आत्माओं की दुनियाहै जहां ५ तत्त्व नहीं होते | आत्माएं और परमात्मा साकारी सृष्टि  में आने से पहले वहां रहते  हैं | परमपिता परमात्मा प्राय:  कल्पभर वहां रहता है | वह सिर्फ संगम युग में अर्थात एक चक्र के अंत दुसरे चक्र के आदि के बीच जो तीव्र परिवर्तन का समय है यहाँ पृथ्वी पर आता है |

सृष्टि का चक्र

इतिहास एक नाटक है जिसमें आत्मा रूपी अभिनेता अपने शरीररूपी वस्त्र के द्वारा पृथ्वीरूपी रंगमंच पर पार्ट बजाती हैं |  यह नाटक चक्र में बंधा हुआ है जिसमें घड़ी की तरह अंत सीधे ही शुरुआत में परिवर्तित हो जाता है | इसके ४ सामान आयु के युग होते हैं : सतयुग (आत्मा और ५ तत्त्वों की अति पवित्रता व शक्ति का समय; अति सुख शांति का समय), त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग (जब आत्मा और ५ तत्त्व अति अपवित्र और कमज़ोर बन जाते हैं; अज्ञानता, दुःख, आशंकि का समय) |  सदेव घूमते हुए चक्र के सामान ये ४ युग क्रमशः एक के बाद दूसरा आते रहते हैं  |

अभी के परिवर्तन का समय

हर चक्र का अंतिम १०० साल संगम युग है जो परिबर्तन का समय है | यह दो चक्रं के बीच का समय है अर्थात पूरे पतन के समय और सच्ची जीवान मुक्ति के समय को जोड़ने वाला  युग  | मनुष्य आत्माएं इसी समय ही अपने आत्मिन पिता से मिलकर अपने बारे में, भगवान के बारे में, सृष्टि के बारे में सच्चाई को जन सकती हैं |   वे सृष्टिकी रचना और विनाश के रहस्य और आदि मध्य अंत को समझ सकती हैं |

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